सोमवार, 20 दिसंबर 2010

'मार् दिया दिल्ली की सर्दी '







                                                  'मार् दिया दिल्ली की सर्दी '                                                                                                                                
                                                                    एल..आर.गान्धी. 


मौसम के खबरीओं का अनुमान है -अबकी बार ठण्ड अपने सभी पिछ्ले रिकर्ड तोड देगी ! पिछली दिसबर की  कम्प्कम्पाती ठण्डी में शीला जी की नगर निगम के अफ्सरों  ने बेघर लोगो का रैनबसेरा गिरा दिया ताकी 
वहाँ पार्क बनाया जाए तो बेघर  लोग उसी स्थान पर ठण्ड से मरने लागे. एक सव्यम सेवी संस्था ने सर्वोच्च न्यायालय को लिखा तो न्यायाक्य ने इसका सख्त नोटिस लेते हुए दिल्ली सरकार को बेघर लोगों के लिए रैनबसेरे दुगने  करने का  आदेश जारी किया. इस बरस शिला जी के अफ्सर फिर दो रैनबसेरे तोड़ते हुए पाए गए तो सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को निर्देश जारी किए की यह निश्चित किया जाए की कोइ भी बेघर इन्सान मरने  न पाए . सारे देश में बेघर इन्सनों के लिए पर्याप्त रैन्बसेरों का प्रबन्ध किया जाए. भविष्य में किसी भी रैनबसेरे को तब तक न तोडा जाए जब तक उसके स्थान पर नए आवास का प्रबन्ध न हो जाए. इसके साथ् ही दिल्ली के सभी ६५ रैनबसेरों को एक सप्ताह के भीतर चालु करने के भी निर्देश दिए गए.
देश की राजधानी जहाँ आधुनिक भारत के सभी सैकुलर शासक बडी बडी आलिशान वातानुकुलित अट्टालिकाओं  में चैन की नींद सोते हैं , वंहीं एक लाख बदनसीब बेघर गरीब इतनी भीषण ठण्ड में भी खुले असमान के नीचे तिल तिल मरने  को मजबूर हैं. शीलाजी का दावा है कि सोनिया जी की सरकार ने सभी के लिए रैन्बसेरों का पक्का इन्तजाम किया है. जबकी मौजुदा रैनबसेरे मात्र ६००० इनसानो को आश्रय दे पाते हैं .एक अनुमान के अनुसार दिल्ली की सर्दी हर रोज १० इनसानों को लील जाति है. निज़ामुदीन क्षेत्र  का एक आदमी जो मृत्कों के शवों के अन्तिम संस्कार का कार्य कर्ता है का कहना है कि पिछ्ली सर्दी में उसने हर रोज ९ लोगो को शम्शान पहुन्चाया .   
देश में ऐसे बेघर जिनके पास सर छुपाने को झोपडी भी  नहीं ,  एक करोड तीस लाख हैं और इन् पर प्रति व्यक्ति ५-६ जीव  आश्रित भी हैं. भीषण सर्दी ही नहीं -मान्सून -भीषण गर्मी , बिमारिया, बच्चो  की पढाई , बेरोजगारी और सबसे बडी समस्या भूख के चलते ये लोग महानग्रों की सड्कों के किनारे प्रति दिन तिल तिल मरते हैं.    
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर  कर्नाटक और गुजरात सरकार तो कुछ हर्कत में आइ हैं  कर्नाटक सरकार ने राज्य के सभी ज़िलाधिशों को और २१४ लोकल बडिज़ को ४९ सूत्री कार्य क्रम के तहत बेघर गरिबों के लिए आवास और भोजन के समुचित प्रबन्धन पर ३ माह के भीतर कार्यान्वन के आदेश दिए हैं . वहीं गुजरात में अहमदाबाद नगर निगम ने बेघर लोगों के लिए ६ डौरमैटारी किसम के आवास 'रैनबसेरे'  बनाने की योजना बनाई है जहाँ बेघर  लोग रात्री के वक्त ठहर सकेंगे और इसके इलावा ऐसे लोगों को रात्री के वक्त रैन्बसेरों, कैमुनीटी केन्द्र , मंदिरों और दिस्पैन्सरिओन् में आश्रय दिया जाएगा.  
वहीं देश के सबसे बडे  प्रदेश उत्तर प्रदेश की  महारानी माया वती जी के पास 'माया' की कमी के चलते इस योजना पर कोइ भी कारवाई करने का न तो वक्त है और न ही पैसा. फिर भी प्यार की धरोहर ताजमहल के लिए मशहूर आगरा में एक श्री निशुल्क जल सेवा दल के बाँके लाल महेश्वरी द्वारा ५० बेघर इन्सानों के लिए एक रैनबसेरा ज़रुर बनाया गया है. माया जी के पास विशाल मूर्तियों ,स्मार्कों, पत्थर के भीमकाय हाथियों के लिए तो करोदों रुपये  हैं मगर इन्सानों के लिए ...........
दिल्ली पुलिस के रेकर्ड के अनुसार २००५ से २००९  तक ऐसे बेघर बेसहारा मरने  वालों की संख्या ३१०३ रही. इस के अतिरिक्त जिन बेसहारा लोगों को पास पड़ोस के लोग खुद ही अन्तिम संस्कार कर देते हैं कि गिन्ती प्रति दिन १० मृत्कों की है. पुलिस की माने तो बेसहारा लोग भीषण गर्मी का शिकार अधिक संख्या में होते हैं.ऐसे मृत्कों में ९४% लोग औस्तान ४२ वर्ष के मजदुरी करने वाले पुरुष होते हैं. मात्र ८% लोग दुर्घटना या हत्या का शिकार होते हैं जबकी ९२% लोग भूख, प्यास ,गर्मी, ठण्ड, बिमारी और निर्धनता के कारण बिना उपचार रोगों जैसे टी.बी. मलेरिया या नशा जन्य रोगों के शिकार हो  जाते हैं .
लौह  पुरुष वल्लभ भाई पटेल ने रियासतों को समाप्त कर देश में लोक तंत्र की नींव इस लिए मज़बूत की कि लोगों द्वारा चुनी गई सरकारें गरीबों और बेसहारा मजलूमों को रोटी कपडा और मकान की मूल भूत सुविधाएँ उपलब्ध करवाएंगी . मगर आज़ादी के ६३ वर्ष बाद भी गरीब और गरीब होता गया और आज हम विश्व के भ्रष्टतम  देशों के सिरमौर हैं. अरे इन सेकुलर शैतानों से तो बेहतर  रियासती रजवाड़े ही थे . रियासती दौर में शहर के सभी साहूकारों को महाराज की विशेष हिदायत थी कि शर्दी के मौसम में वे अपनी हवेली के अहाते में 'अलाव' जलाएं ताकि बेघर -गरीब लोग और जानवर ठण्ड से राहत पा सकें . इसके इलावा सभी सम्प्रदायों की अपनी अपनी धर्म शालाये और रियासत के रैनबसेरे बेघर लोगों को ठण्ड व् गर्मी से राहत के लिए खोल दिए जाते थे जहाँ भोजन और जलपान की व्यवस्था के अतिरिक्त धर्मार्थ संस्थाएं कम्बल-रजाई निशुल्क उपलब्ध करवातीं थी . पशुओं को  गौशाला में आश्रय  और आहार मिल जाता था. अब इंसानों का यह हाल है- पशुओं का तो बस भगवान ही मालिक है.   
दिल्ली के रईसजादों के लिए तो सर्दी का मौसम उस फिल्मी गीत की माफीक है....'प्यार तेरा दिल्ली की सर्दी' ... और बेघर गरिबों के लिए 'मार् दिया दिल्ली की सर्दी....        

1 टिप्पणी:

  1. ऐसी ही सर्दी में बंटवार के बाद आये लोगों को सड़क पर रहने को मजबूर कर दिया गया था...

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