शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

आरामदेह जीवन-मृत्यु




आरामदेह जीवन-मृत्यु दिवस.

एल.आर.गाँधी.

९ अक्तूबर , आज विश्व रुग्नाश्र्य व् आरामदेह मृत्यु दिवस है. दुखी- रोग पीड़ित मानवता को सहज व् आरामदेह जीवन देने के प्रयासों को नई दिशा देने पर विचार करने के
लिए वर्ल्ड वाईड पालिएटिव केअर एलायंस द्वारा इस कार्य के लिए यह दिन चुना
गया है. विश्व में १०० मिलियन रोगियों को पेलीएटिव केयर की दरकार है मगर
हम यह सुविधा मात्र ८ % तक ही पहुँचाने में सक्षम हो पाए हैं . गंभीर रोगों
से पीड़ित ,निराश्रय व् निर्धन एकांकी लोगों के जीवन को सहज व् आरामदेह
बनाने के लिए पूरे समाज व् राजतंत्र के सहयोग की आवश्यकता है. इस कार्य के
लिए ८० देशों में उक्त संस्था द्वारा १००० के करीब जागरूकता समारोह आयोजित
किये जा रहे हैं.
जहाँ आरामदेह जीवन कि सुविधा नहीं, वहां सहज मृत्यु की आशा कैसे की जा
सकती है. सहज व् आरामदेह जीवन-मृत्यु का मूलाधार समाजिक सम्पन्नता है.जिस
देश की आधी से अधिक जनता को दो जून की रोटी के लाले पड़े हों वहां पर यह
सुविधा बेमानी सी लगती है. बेशक हमारे संविधान में सम्मानजनक मृत्यु
प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है फिर भी मृत्यु की गुणवत्ता में हमारा
विश्व में ४० वां स्थान है.हम युगांडा जैसे देश से भी पीछे हैं जिसका जी डी
पी में ९० वां स्थान है जबकि भारत का ४था . जो देश अपने नागरिकों के लिए
स्वस्थ सेवाओं पर मात्र १% खर्च करता हो उससे कोई अपेक्षा भी कैसे की जा
सकती है. आज हमारे ६५ से ऊपर के वृष्ट नागरिको कि संख्या ५ वर्ष से कम
जनसँख्या से अधिक हो गई है और २०३० आते आते यह एक बिलियन का आंकड़ा पार कर
जाएगी. विश्व के १/८ बड़े बूढों के लिए स्वस्थ्य सुविधाओं के साथ साथ
आरामदेह जीवन -सहज मृत्यु का प्रबंध करना हमारा सामाजिक व् मानवीय दायित्व
बनता है.
जनसँख्या नियंत्रण, गरीबी उन्मूलन, स्वस्थ्य सुविधाएं , वृधाश्रम जैसी
जनकल्याण योजनाओं से पीठ मोड़े हमारे भ्रष्ट लोकतंत्र के राजनेता किसी
न्रंकुश रजवाड़ों से कम नहीं दिखाई पड़ते. बहुत जल्द ही ये अपने आप को
विश्व की दूसरी महान्शक्ति कहलाने की फिराक में बड़े बड़े खेल-तमाशे कर
हवा में खुद भी उड़ रहे हैं और गरीब जनता की खून पसीने की कमाई को भी उड़ा
रहे हैं.
खाद्य सुरक्षा कानून जैसी बड़ी बड़ी डींगे हांकने वाली सरकार देश के
किसानों द्वारा अपने खून पसीने से पैदा की गई 'बम्पर' पैदावार को तो संभाल
नहीं पाती .डाक्टर एम्.एस स्वामीनाथन -' यह शर्मनाक है. यदि यह सरकार जरूरत
मंद भूखी जनता के लिए अपने खाद्यान को तो बचा नहीं पाती तो यह किस मूंह से
खाद्य सुरक्षा क़ानून लागु करने की बात कर सकती है. जो गरीब को रोटी का
निवाला तक नहीं दे सकते वे रोगी को दवा क्या देंगे ?

3 टिप्‍पणियां:

  1. जो गरीब को रोटी का
    निवाला तक नहीं दे सकते वे रोगी को दवा क्या देंगे ? यही सत्य है और इन धर्मनिरपेक्षियों से यही उम्मीद है..

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  2. यदि यह सरकार जरूरत
    मंद भूखी जनता के लिए अपने खाद्यान को तो बचा नहीं पाती तो यह किस मूंह से
    खाद्य सुरक्षा क़ानून लागु करने की बात कर सकती है |
    हमारे भ्रष्ट लोकतंत्र के राजनेता किसी
    निरंकुश रजवाड़ों से कम नहीं दिखाई पड़ते |

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