
जब से एक अर्थशास्त्री ने देश की कमान सम्हाली है….देश की अर्थव्यवस्था ही ज़मींदोज़ नहीं हुयी बल्कि राजनैतिक व्यवस्था भी रसातल में जा समाई है.
सिंह साहेब ने जब से ‘चवन्नी’ का चलन बंद किया है तब से लोग अठन्नी को भी उसी नज़र से देखने लगे हैं और इसका चलन भी लगभग ख़तम हो गया है. अठन्नी की दुर्दशा भांपते हुए रिजर्व बैंक ने लोगों में भरपूर अठन्नियां बाँट कर इसे फिर से पुनर्जीवित करने की नाकाम कोशिश तो की है मगर ‘कोई इसे भाव देने के मूड में नहीं’. रही बात रुपैये की … काफी अरसे से बीमार चल रहा है ..और अपनी बीमारी को ‘निजता और सिकियोरिटी’ के नाम पर छुपाए चला जा रहा है. अब तो बस थोड़ी बहुत गाँधी छाप ५००-१००० की ही पूछ है.
जैसे रूपए की बीमारी और उदासीनता के साथ ही चवन्नी बे मोल हो गई वैसे ही हमारे सिंह साहेब भी मैडम की कृपा से पी.एम्. की कुर्सी पर बैठे तो हैं मगर कीमत चवन्नी की भी नहीं रही.. बेचारी को कोई पूछता ही नहीं. जब से पहले बिहार में और फिर यू.पी. में किसी ने अठन्नी को मूंह नहीं लगाया तभी से ‘दिग्गी’ जैसे धेल्ले विचलित हो चले हैं. आज अठन्नी को नहीं पूछा कल ‘रुपी’ को नकार देंगे… ऐसे कैसे चलेगा. अठन्नी को कोई बड़ा .रूप.-.रुतबा दे कर बाज़ार में उतारा जाए … यह भी सुझाव आया कि खारिज और बेमोल चवन्नी के स्थान पर अठन्नी की ताजपोशी कर दी जाय ..फिलहाल आकर्षक द्वान्नी को भी मार्कीट में उतारा गया है ताकि अठन्नी और ‘रूपी ‘ की गैरहाजिरी की भरपाई की जा सके. सुपारिपाक मिडिया को भांड गिरी का काम सौंप दिया गया है.
‘रूपी’ बीमार है …अठन्नी’ चल नहीं पा रही …चवन्नी का कोई मोल नहीं … अब तो द्वान्नी या फिर सुपारिपाक मिडिया का ही सहारा है….
ho hi jaayegi vyastha inki bhi taajposhi ki.
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