गुरुवार, 16 जून 2011

गंगा पुत्र निगमानंद के कातिल : काले अँगरेज़

गंगा पुत्र निगमानंद के कातिल:  काले अँगरेज़ 
          
                   एल.आर .गाँधी 


भागीरथ की गंगा - भीषम पितामह की माता -भगवान कृष्ण का जल रूप ,शिव की शिरो धारा- हिन्दुओं का हिंदुत्व -आज  खतरे में है.  खतरा है उन इन्डियन काले अंग्रेजों से जो भारतीय संस्कृति के समूल नाश के मंसूबे पाले बैठे हैं - एक गंगा पुत्र ने काले अंग्रजों से गंगा की रक्षा में अपने प्राणों की आहूति दे कर १३ जून २०११ समाधि ले ली. स्वामी निगमानंद ने १२ वर्ष तक माँ गंगा का अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष किया और आखिर में ११३ दिन के घोर संघर्ष और अनशन के बाद अपने प्राणों की आहुति दे दी .
स्वामीजी ने गंगा तट पर स्टोन क्रेशर हटाने के लिए लम्बा संघर्ष किया . १२ में से ११ क्रेशर तो हटा लिए गए किन्तु    हिमालय स्टोन क्रेशर सरकार, प्रसाशन  और चंद परम आदरणीय न्यायधीशो की मिलीभगत से चालु रहा . मात्री सदन का आरोप है की स्वामी जी को जिला अस्पताल में ही ज़हर का इंजेक्शन लगाया गया जिसके कारन उनकी मौत हो गई. 
स्वामी जी की मौत भी उसी हस्पताल में हुई जहाँ स्वामी रामदेव जी का हाल चाल जानने के लिए देश के नेता, साधू और मिडिया वालों का मजमा लगा था.  किसी ने इस महान क्रन्तिकारी साधू की सुध नहीं ली जो एक पवित्र कार्य के लिए आज तक के सबसे लम्बे 'अनशन' पर थे. 
स्वामी  निगमानंद सरस्वती जी के बलिदान ने देश के भ्रष्ट  नेताओं के साथ साथ मिडिया, संत समाज ,नौकरशाही,  परियावरण माफिया और ' काले अंग्रेजों को भी नंगा कर दिया है. 
गंगा के नाम पर हमारे इन काले अंग्रेजों ने राजनीती तो खूब की ताकि धरम परायण हिन्दू वोट बैंक को भुनाया जाए. मगर गंगा की सफाई के लिए अनेक योजनाओं पर करोड़ों रूपए खर्च कर भी गंगा और मैली होती चली गई. विश्व वन्य जीव कोष की रपट है की १० प्रमुख विलुप्त  होती नदियों में गंगा का नाम शीर्ष पर है. और यही हाल हिमालय का है. गंगा की धारा को बिना किसी प्रकार के अवरोध के चालू रखने के लिए १९१७ में पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने नेत्रित्व में एक प्रतिनिधिमंडल अंग्रज सरकार से मिला - पर्यावरण और हिन्दुओं की आस्था को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सर्कार ने अपने आदेश न : १०२ तिथि २०.४.१९१७ के अंतर्गत गंगा की धारा में व्यवधान को IPC२९५ के अंतर्गत अपराध घोषित कर दिया  . आज काले अंग्रेजों के राज में यह अपराध धड़ल्ले से किया जा रहा है.                                                          
 १९७० में गंगा बचाव योजना बनाई गई और गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्ज़ा दिया गया . १९८५ में जब राजीव गाँधी प्रधान मंत्री बने तो गंगा एक्शन प्लान बनाया गया , फिर १९८९ में प्रदूषण मुक्त गंगा निति बने गई - मगर मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की. गंगा का जल और भी मटमैला  होता चला गया . २००९ में हमारे मनमोहन सिंह जी ने एन.जी.आर.बेसिन अथारटी का गठन कर घोषणा कर डाली की २०२० तक गंगा को सम्पूर्ण रूप से प्रदूषण मुक्त कर दिया जाएगा . पर्यवरण विशेषग्य डॉ अगरवाल के अनुसार - गंगा शुद्धिकरण के नाम पर सरकारी खजाने को दोनों हाथों से लूटा गया. सरकार की  CAG और PAC  समितियों ने भी गंगा के नाम पर लूट के कई खुलासे किये ,मगर कोई कार्रवाही नहीं की गई. पिछले १५ साल में ९०१.७१ करोड़ खर्च किये गए मगर गंगा और भी मैली हो गई. इस साल के बजट  में बंगाली बाबु ने नदियों की सफाई के लिए २०० करोड़ मजूर किये हैं . 
हिन्दुओं की धार्मिक आस्था के प्रतीक को संजोने के लिए पिछले  १५ साल में ९०० करोड़ खर्च या लूटे गए. हज के लिए हर साल ८०० करोड़ ? इसे कहते हैं सेकुलर सरकार. भारत की नदिया भारतियों के लिए शुद्ध जल का मुख्य स्त्रोत हैं.  प्रदूषित जल से होने वाली बिमारिओं से हर वर्ष २२ लाख बच्चे अपना पांचवा जन्म दिन नहीं मना पाते और अकाल मृत्यु की गोद में समा जाते हैं.
मिडिया को तो इन राष्ट्रीय महत्त्व की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं उन्हें तो बस अपनी TRP से मतलब है. या फिर सरकार की चाटुकारिता से . हो भी क्यों न एक एक चेनल को सरकार प्रति दिन की लगभग २२ लाख की ADS जो देती है और वो भी हमारे द्वारा दिए टैक्स में से . स्वामी निगमानंद की मृत्यु के बाद उनके परिजनों के बखेड़े को सारा मिडिया खूब उछालने में लगा है तांकि लोगों का ध्यान असली मुद्दों से भटकाया जा सके. 

1 टिप्पणी:

  1. यही तो दुर्भाग्य है कि असली मुद्दे को हवा कर दिया जाता है.

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