सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

न क्षुधासम : शत्रु :....चाणक्य !

न क्षुधासम: शत्रु : !........चाणक्य
भूखा व्यक्ति कोई भी पाप कर सकता है. अत : सरकार का कर्त्तव्य है कि देश में कोई भी भूखा न रहे , इसके लिए कृषि के विकास के साथ सूखे तथा बाढ़ से बचाव के साथ साथ ऐसी योजनाये बनानी और कार्यान्वित करनी चाहियें जिस से प्रतीयेक नागरिक को रोजगार उपलब्ध हो. चाणक्य के अनुसार आदर्श राज तंत्र वही है जिसकी योजनायें प्रजा को उसकी आजीविका के मौलिक अधिकार से वंचित करने वाली न हों. उसे लम्बी चौड़ी योजनाओं के नाम से कर भार से आक्रान्त न कर डालें . योजनायें राजकीय व्ययों से बचत करके ही चलाई जानी चाहियें । सरकार का ग्राह्य भाग दे कर बचे प्रजा के टुकड़ों के भरोसे पर लम्बी चौड़ी योजनायें छेड़ बैठना प्रजा का उत्पीडन है।
पिछले ६३ साल से हम यही कर रहे है। नेहरूजी कि पंच वर्षीया योजनाओं पर खरबों रुपये पानी कि तरहं बहाए गए और इन योजनाओं का वास्तविक लाभ सामान्य जन तक पहुँच भी रहा है या नहीं इस पर किसी ने सोचा ही नहीं । चार दशक बाद आखिर राजिव गाँधी को कहना ही पडा कि हमारी योजनाओं का केवल १०% ही आम आदमी तक पहुँच पाता है। फिर यह बाकी का ९०% सरकारी धन कहाँ गया इस पर राजीव भी छुपी साध गए । अंदर से वह भी जानते थे कि यह धन उनके ही क्वात्रोचिओं ने स्विस बैंकों में पहुंचा दिया है।
देश के सबसे बड़े चोरों का आज ७०,००० करोड़ विदेशी बैंकों में जमा है।और गरीब देश कि ७८% असहाय जनता २० रुपये प्रति दिन पर गुज़र बसर करने को मजबूर है। गरीब के लिए दाल-सब्जी कि कटोरी १०/- और रोटी २/- दूसरी ओर सांसदों के लिए संसद कि कैंटीन में दाल-सब्जी की कटोरी ५/- और रोटी ५० पैसे में।
देश पर अरबों रुपये का विदेशी कर्जा है। और हम कामन वेल्थ खेलों की तयारी में मस्त हैं, १.६ बिल्लियन यू एस डालर तो खर्च हो चुके कलमाड़ी जी अभी और मांग रहे है। कलमाड़ी जी के खेल गाँव के निर्माण में लगे १५०००० मजदूर कहर की ठण्ड में यमुना किनारे ठिठुर रहे है और इनमें १५००० महिलायें भी हैं । इन्हें एक इंसान के लिए अपेक्षित मूल भूत सुविधा के नाम पर पीने का पानी और दीर्घशंका के लिए स्थान भी उपलब्ध नहीं। दिल्ली हाई कोर्ट की लताड़ के बाद डी एम् सी ने इनके लिए कुछ तम्बू गाड़े है। इन्हीं तम्बू ओं में चोकी लामा जैसे मजदूर और अलोक व् सदाम जैसे यतीम बच्चे फटे हाल कम्बलों में एक दूजे की साँसों की गर्मी के सहारे ,चंद दिनों के लिए ही सही अपने भाग्य पर इतरा रहे हैं है।

1 टिप्पणी:

  1. कैसा लोकतन्त्र. लूटतन्त्र है. कबीले हैं, मुखौटा बकरी का चढ़ाये हुये. हिस्सा बांटने को तैयार.

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