कीचड़ वृति
एल आर गांधी
पुरानी कहानी है एक महात्मा नदी किनारे बैठा ,कीचड़ में लिप्त मरणप्राय बिच्छू को कीचड़ से बाहर निकलता और बिच्छू उसे काट लेता। महात्मा फिर से बिच्छू को कीचड़ से निकलता और बिच्छू फिर काटता … एक राह गीर ने महात्मा से पूछा … महात्मन् बार बार इसे बचाने का प्रयास कर रहे हो और यह दुष्ट जीव आप को बार बार दंश मार कर पीड़ा पहुंचा रहा है … आप इसे मरने के लिए छोड़ क्यों नहीं देते ।
महात्मा राहगीर को प्रत्युत्तर देते हुए कहते हैं … जब यह जीव अपनी दुष्ट वृति को त्यागने को त्यार नहीं तो मैं अपनी साधुवृति को क्यों त्यागूँ !
पृथ्वी पर स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर को प्राकृतिक आपदा बाढ़ ने घेर लिया तो हज़ारों सेना के जवान लाखों कश्मीरिओं की जान बचाने के लिए दिन-रात अपनी जान हथले पर रख कर बचाव कार्यों में जुट गए .... बदले में कुछ अलगाववादी बिच्छू-वृति के देश द्रोही तत्त्व सेना के जवानो पर हमले कर रहे हैं , एक जवान का तो हाथ ही काट दिया … अब जवानो को बाढ़ में घिरे असहाय लोगों के साथ -साथ अपनी गन का भार भी उठाना पड़ रहा है … सेना को आपदा में अपने नागरिको की रक्षा के साथ साथ आत्मरक्षा की शिक्षा भी दी जाती है … वे कितने ही मक्कार हो जाएं , मगर हम अपने संस्कार नहीं त्याग अकते … यदि ऐसा किसी पश्चिमी या अरबी देश में होता तो बिच्छू-वृति के ऐसे देश द्रोहिओं को 'कीचड़ में मरने के लिए ' छोड़ दिया जाता …
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