हम लोग दुखी जीवन से त्रस्त जन्म जन्म के बंधनों से मुक्ति की आकांक्षा में निरंतर ईश्वरोपासना में व्यस्त थे. - तो अँगरेज़ कष्टकारी रोगों से मुक्त कर इसी जीवन को सहज और उन्मुक्त करने में प्रयासरत था.
. १४ मई १७९६ को यह सौभाय प्राप्त हुआ जेनर नामक एक अँगरेज़ वैज्ञानिक को जब सर्वप्रथम उसने चेचक के टीके का आविष्कार कर डाला. जेनर के टीके ने चेचक को तो नेस्तोनाबूद कर दिया किन्तु 'टीका' इंजेक्शन के अवतार में खुद समाज के समस्त रोगों की राम बाण संजीवनी बन बैठा. हर कोई 'टीका' जेब में लिए घूम रहा है.कब,कहाँ, कैसे और किसके लगाना पड़ जाए क्या मालूम ! समस्त असाध्य बिमारिओं का ही नहीं ,अब तो जटिल समस्स्याओं का भी एक मात्र उपचार है 'टीका'. नीम हाकिम ख़तरा ए जान के पास भी जब कोई आहात मरीज़ आता है, तो पहला शब्द एक ही होता है ! डाक्टर बचा लो -बस झट से कोई टीका लगा दो !
गत दिनों 'टीके' की माया देख, हम तो बस देखते ही रह गए ! हमारे एक मित्र नए नए आयुर्वेदिक डाक्टरी का कोर्स कर अपने आर.एम्.पी पिताश्री के क्लिनिक में 'दीन दुखिओं ' के उपचार में मशगूल थे, हम भी जा बैठे -चुपके से . डाक्टर साहेब स्टेथो 'गले' में लटकाए एक मरीज़ की हार्ट बीट जांच रहे थे. इसके बाद दूसरे मरीज़ की पसलिओं का मुआयना किया,और फिर एक मरीज़ की अवरुद्ध छाती छान मारी.हम हैरान परेशान ! अरे स्टेथो बिना कान में लगाये ही..
खैर ! अब डाक्टर साहेब एक महिला के तीव्र अनुरोध पर 'इमरजेंसी ट्रीटमेंट 'यानि कि 'टीका' लगा रहे थे. महिला को बैंच पर आड़ी-टेढ़ी बिठाया और लगा दिया टीका.. और वह भी साडी के ऊपर से ही - टीका तो लग गया किन्तु टिके की पिचकारी से बैंच गीला हो गया ! बाद में उपचार से संतुष्ट महिला अपनी बहिना से बतिया रही...कमाल के डाक्टर हैं जी...'टीका' लगाते है कि पता ही नहीं चलता...
यह अँगरेज़ के अंग्रेजी टीके ही का तो कमाल जी - हर हिन्दुस्तानी नागरिक 'इंडियन सिटिज़न ' हो गया . हिंदी फिल्मों का नायक फिल्म फेयर अवार्ड पा कर बाग़ बाग़ तो होता है पर 'दो शब्द' आइ लव यू इंडिया अंग्रजी में ही कह पाता है.
अब तो हमारी पत्रकार बिरादरी भी पाठकों कि सुविधा के नाम पर 'हिंगलिश' शब्दावली पर ख़ास ध्यान देते है. पिछड़ेपन का प्रतीक हो कर हो कर रह गई 'विशुद्ध हिंदी' . है न ! अंग्रेजी टीके का कमाल !
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
न क्षुधासम : शत्रु :....चाणक्य !
न क्षुधासम: शत्रु : !........चाणक्य
भूखा व्यक्ति कोई भी पाप कर सकता है. अत : सरकार का कर्त्तव्य है कि देश में कोई भी भूखा न रहे , इसके लिए कृषि के विकास के साथ सूखे तथा बाढ़ से बचाव के साथ साथ ऐसी योजनाये बनानी और कार्यान्वित करनी चाहियें जिस से प्रतीयेक नागरिक को रोजगार उपलब्ध हो. चाणक्य के अनुसार आदर्श राज तंत्र वही है जिसकी योजनायें प्रजा को उसकी आजीविका के मौलिक अधिकार से वंचित करने वाली न हों. उसे लम्बी चौड़ी योजनाओं के नाम से कर भार से आक्रान्त न कर डालें . योजनायें राजकीय व्ययों से बचत करके ही चलाई जानी चाहियें । सरकार का ग्राह्य भाग दे कर बचे प्रजा के टुकड़ों के भरोसे पर लम्बी चौड़ी योजनायें छेड़ बैठना प्रजा का उत्पीडन है।
पिछले ६३ साल से हम यही कर रहे है। नेहरूजी कि पंच वर्षीया योजनाओं पर खरबों रुपये पानी कि तरहं बहाए गए और इन योजनाओं का वास्तविक लाभ सामान्य जन तक पहुँच भी रहा है या नहीं इस पर किसी ने सोचा ही नहीं । चार दशक बाद आखिर राजिव गाँधी को कहना ही पडा कि हमारी योजनाओं का केवल १०% ही आम आदमी तक पहुँच पाता है। फिर यह बाकी का ९०% सरकारी धन कहाँ गया इस पर राजीव भी छुपी साध गए । अंदर से वह भी जानते थे कि यह धन उनके ही क्वात्रोचिओं ने स्विस बैंकों में पहुंचा दिया है।
देश के सबसे बड़े चोरों का आज ७०,००० करोड़ विदेशी बैंकों में जमा है।और गरीब देश कि ७८% असहाय जनता २० रुपये प्रति दिन पर गुज़र बसर करने को मजबूर है। गरीब के लिए दाल-सब्जी कि कटोरी १०/- और रोटी २/- दूसरी ओर सांसदों के लिए संसद कि कैंटीन में दाल-सब्जी की कटोरी ५/- और रोटी ५० पैसे में।
देश पर अरबों रुपये का विदेशी कर्जा है। और हम कामन वेल्थ खेलों की तयारी में मस्त हैं, १.६ बिल्लियन यू एस डालर तो खर्च हो चुके कलमाड़ी जी अभी और मांग रहे है। कलमाड़ी जी के खेल गाँव के निर्माण में लगे १५०००० मजदूर कहर की ठण्ड में यमुना किनारे ठिठुर रहे है और इनमें १५००० महिलायें भी हैं । इन्हें एक इंसान के लिए अपेक्षित मूल भूत सुविधा के नाम पर पीने का पानी और दीर्घशंका के लिए स्थान भी उपलब्ध नहीं। दिल्ली हाई कोर्ट की लताड़ के बाद डी एम् सी ने इनके लिए कुछ तम्बू गाड़े है। इन्हीं तम्बू ओं में चोकी लामा जैसे मजदूर और अलोक व् सदाम जैसे यतीम बच्चे फटे हाल कम्बलों में एक दूजे की साँसों की गर्मी के सहारे ,चंद दिनों के लिए ही सही अपने भाग्य पर इतरा रहे हैं है।
भूखा व्यक्ति कोई भी पाप कर सकता है. अत : सरकार का कर्त्तव्य है कि देश में कोई भी भूखा न रहे , इसके लिए कृषि के विकास के साथ सूखे तथा बाढ़ से बचाव के साथ साथ ऐसी योजनाये बनानी और कार्यान्वित करनी चाहियें जिस से प्रतीयेक नागरिक को रोजगार उपलब्ध हो. चाणक्य के अनुसार आदर्श राज तंत्र वही है जिसकी योजनायें प्रजा को उसकी आजीविका के मौलिक अधिकार से वंचित करने वाली न हों. उसे लम्बी चौड़ी योजनाओं के नाम से कर भार से आक्रान्त न कर डालें . योजनायें राजकीय व्ययों से बचत करके ही चलाई जानी चाहियें । सरकार का ग्राह्य भाग दे कर बचे प्रजा के टुकड़ों के भरोसे पर लम्बी चौड़ी योजनायें छेड़ बैठना प्रजा का उत्पीडन है।
पिछले ६३ साल से हम यही कर रहे है। नेहरूजी कि पंच वर्षीया योजनाओं पर खरबों रुपये पानी कि तरहं बहाए गए और इन योजनाओं का वास्तविक लाभ सामान्य जन तक पहुँच भी रहा है या नहीं इस पर किसी ने सोचा ही नहीं । चार दशक बाद आखिर राजिव गाँधी को कहना ही पडा कि हमारी योजनाओं का केवल १०% ही आम आदमी तक पहुँच पाता है। फिर यह बाकी का ९०% सरकारी धन कहाँ गया इस पर राजीव भी छुपी साध गए । अंदर से वह भी जानते थे कि यह धन उनके ही क्वात्रोचिओं ने स्विस बैंकों में पहुंचा दिया है।
देश के सबसे बड़े चोरों का आज ७०,००० करोड़ विदेशी बैंकों में जमा है।और गरीब देश कि ७८% असहाय जनता २० रुपये प्रति दिन पर गुज़र बसर करने को मजबूर है। गरीब के लिए दाल-सब्जी कि कटोरी १०/- और रोटी २/- दूसरी ओर सांसदों के लिए संसद कि कैंटीन में दाल-सब्जी की कटोरी ५/- और रोटी ५० पैसे में।
देश पर अरबों रुपये का विदेशी कर्जा है। और हम कामन वेल्थ खेलों की तयारी में मस्त हैं, १.६ बिल्लियन यू एस डालर तो खर्च हो चुके कलमाड़ी जी अभी और मांग रहे है। कलमाड़ी जी के खेल गाँव के निर्माण में लगे १५०००० मजदूर कहर की ठण्ड में यमुना किनारे ठिठुर रहे है और इनमें १५००० महिलायें भी हैं । इन्हें एक इंसान के लिए अपेक्षित मूल भूत सुविधा के नाम पर पीने का पानी और दीर्घशंका के लिए स्थान भी उपलब्ध नहीं। दिल्ली हाई कोर्ट की लताड़ के बाद डी एम् सी ने इनके लिए कुछ तम्बू गाड़े है। इन्हीं तम्बू ओं में चोकी लामा जैसे मजदूर और अलोक व् सदाम जैसे यतीम बच्चे फटे हाल कम्बलों में एक दूजे की साँसों की गर्मी के सहारे ,चंद दिनों के लिए ही सही अपने भाग्य पर इतरा रहे हैं है।
शुक्रवार, 29 जनवरी 2010
खुशनसीब ...चोकी लामा !
अपने नसीब पर इतरा रहा है चोकी लामा ! भला हो बहिन सुशीला जी का जिन्होंने हम जैसे बदनसीबों को इतनी ठंडी में टैंट की ओट मुहया करवा दी.ठाठ से अपने जूते सर के नीचे दबा कर रात भर सोने के प्रयास में मशगूल रहते हैं '.तकिये का तकिया हिफाज़त की हिफाजत ' ग़ालिब मियां भी क्या खूब फरमा गए ' मौत का एक दिन मुययन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती. अमां मौत आए हमारे दुश्मनों को हम तो जो काम शीला जी ने सौंपा है उसे पूरा किये बिना नहीं जाने वाले.
जज साहेब के झटके से जागी है शीलाजी की एम् सी डी !, यह बात अलग है इतनी ठंडी में एम् सी डी के जागते जागते २५०' चोकी लामाज ' हमेशा हमेशा के लिए 'ठंडाकाल' की गोद में समां गए.
दिल्ली एक बड़े जलवे के आयोजन में मशरूफ है. कामन वेल्थ गेम्स की तैय्यारी में कलमाड़ी के साथ साथ शीलाजी की मुस्कान और मनमोहनजी की शान भी दाव पर लगी है. कलमाड़ी जी जितना मांगते हैं मिल जाता है. मांग १.६ बिलियन यू. एस . डालर को पार किये जा रही है. निर्माण कार्य दिन रात चल रहा है. निर्माण समय पर पूरा हो जाएगा -कलमाड़ी जी लाख आश्वासन दें ,ये मिडिया वाले कमबख्त मानते ही नहीं !अरे भई -लाखों चोकी लामा लगे हैं काम पर... भले लोग हैं ..मेहनती हैं.. पापी पेट की खातिर ही सही समय रहते काम तो पूरा करके ही छोडेंगे .
अब मिडिया लाख अफवाहें फैलाए कि खेल गाँव के निर्माण में लगे डेढ़ लाख मजदूर बिना मूल भूत सुविधाओं के यमुना किनारे मर खप रहे हैं . अब सरकार ने तो ठेका दे दिया ! ठेकेदार की लेबर का भी ठेका सरकार ने लिया है क्या ! इनकी तो आदत है बेमतलब की हाय तौबा मचाने की . १९८२ में पिछले खेले ! वाही एशियन गेम्स ...के वक्त भी इन्होने ऐसी ही गैर ज़रूरी अफवाहें फैलाए थीं ..ना मालूम कितने कागद काले किये थे . बेचारे मजबूर हैं अपनी आदत से..तब भी लाखों मजदूर आये थे' खेल गाँव ' बनाने . गाँव बनाते बनाते यमुना किनारे झोंपड़े बना कर खुद भी बस गए. आखिर बेचारी बेबस सरकार को बुलडोज़र चला कर इन्हें गिराना पड़ा...अतिक्रमण जो ठेहरा...फिर देश की राजधानी दिल्ली के सौन्दर्य का भी तो सवाल है.
अब ये चोकी लामा फिर से सराए को घर मान कर पसारेंगे ..तो शीलाजी ने बुलडोज़रों की क्या आरती उतारनी है.?
जज साहेब के झटके से जागी है शीलाजी की एम् सी डी !, यह बात अलग है इतनी ठंडी में एम् सी डी के जागते जागते २५०' चोकी लामाज ' हमेशा हमेशा के लिए 'ठंडाकाल' की गोद में समां गए.
दिल्ली एक बड़े जलवे के आयोजन में मशरूफ है. कामन वेल्थ गेम्स की तैय्यारी में कलमाड़ी के साथ साथ शीलाजी की मुस्कान और मनमोहनजी की शान भी दाव पर लगी है. कलमाड़ी जी जितना मांगते हैं मिल जाता है. मांग १.६ बिलियन यू. एस . डालर को पार किये जा रही है. निर्माण कार्य दिन रात चल रहा है. निर्माण समय पर पूरा हो जाएगा -कलमाड़ी जी लाख आश्वासन दें ,ये मिडिया वाले कमबख्त मानते ही नहीं !अरे भई -लाखों चोकी लामा लगे हैं काम पर... भले लोग हैं ..मेहनती हैं.. पापी पेट की खातिर ही सही समय रहते काम तो पूरा करके ही छोडेंगे .
अब मिडिया लाख अफवाहें फैलाए कि खेल गाँव के निर्माण में लगे डेढ़ लाख मजदूर बिना मूल भूत सुविधाओं के यमुना किनारे मर खप रहे हैं . अब सरकार ने तो ठेका दे दिया ! ठेकेदार की लेबर का भी ठेका सरकार ने लिया है क्या ! इनकी तो आदत है बेमतलब की हाय तौबा मचाने की . १९८२ में पिछले खेले ! वाही एशियन गेम्स ...के वक्त भी इन्होने ऐसी ही गैर ज़रूरी अफवाहें फैलाए थीं ..ना मालूम कितने कागद काले किये थे . बेचारे मजबूर हैं अपनी आदत से..तब भी लाखों मजदूर आये थे' खेल गाँव ' बनाने . गाँव बनाते बनाते यमुना किनारे झोंपड़े बना कर खुद भी बस गए. आखिर बेचारी बेबस सरकार को बुलडोज़र चला कर इन्हें गिराना पड़ा...अतिक्रमण जो ठेहरा...फिर देश की राजधानी दिल्ली के सौन्दर्य का भी तो सवाल है.
अब ये चोकी लामा फिर से सराए को घर मान कर पसारेंगे ..तो शीलाजी ने बुलडोज़रों की क्या आरती उतारनी है.?
शनिवार, 23 जनवरी 2010
ग्लानी- मनमोहन के नान स्टेट खिलाड़ी.
पाक खिलाडी खेल की मंडी में नहीं बिक पाए तो ग्लानी जी बुरा मान गए और झट से ब्यान दाग डाला कि अब हम भी अपने नान स्टेट एक्टर्स को अपनी मनमानी करने से नहीं रोक पाएंगे। और इंडिया का सिकुलर प्रेस भी शर्म से पानी पानी हो बर्फ कि माफिक जमा जा रहा है।
अब मनमोहन जी ग्लानी को बार बार अपने इन ख़ूनी खिलाडिओं पर लगाम कसने कि गुज़ारिश करते आए हैं तो सिंह साहेब को भी तो अपने इन आइ. पि. एल. के नान स्टेट एक्टर्स को समझाना चाहिए कि 'भई एक आध खरीद डालो '। अब ये ठहरे गेंद- बल्ले के शातिर व्यापारी ..घाटे का सौदा कैसे कर लें । खुदा ना खस्ता आइ. पी. एल. मैचो के बीच ग्लानी जी के नान स्टेट एक्टर २६/११ जैसा कोई और घिनौना खेल खेल बैठे और भोले भले भारतीय दर्शक बुरा मान गए.... और पाक खिलाडिओं पर बिफर गए ... तो उनका तो करोड़ों का धंधा चौपट हो जायेगा । उनकी खून पसीने कि कमाई है....
वे मनमोहन सरकार तो नहीं जो ग्लानी के नान स्टेट एक्टर्स के रख रखाव पर ही ३३ करोड़ लुटा दें ।' अतिथि देवो भव ' ऐसी भी क्या मेहमान नवाजी सवा साल से ग्लानी के नान स्टेट एक्टर्स के ९ ताबूत सम्हाले बैठे हैं।
अब मनमोहन जी ग्लानी को बार बार अपने इन ख़ूनी खिलाडिओं पर लगाम कसने कि गुज़ारिश करते आए हैं तो सिंह साहेब को भी तो अपने इन आइ. पि. एल. के नान स्टेट एक्टर्स को समझाना चाहिए कि 'भई एक आध खरीद डालो '। अब ये ठहरे गेंद- बल्ले के शातिर व्यापारी ..घाटे का सौदा कैसे कर लें । खुदा ना खस्ता आइ. पी. एल. मैचो के बीच ग्लानी जी के नान स्टेट एक्टर २६/११ जैसा कोई और घिनौना खेल खेल बैठे और भोले भले भारतीय दर्शक बुरा मान गए.... और पाक खिलाडिओं पर बिफर गए ... तो उनका तो करोड़ों का धंधा चौपट हो जायेगा । उनकी खून पसीने कि कमाई है....
वे मनमोहन सरकार तो नहीं जो ग्लानी के नान स्टेट एक्टर्स के रख रखाव पर ही ३३ करोड़ लुटा दें ।' अतिथि देवो भव ' ऐसी भी क्या मेहमान नवाजी सवा साल से ग्लानी के नान स्टेट एक्टर्स के ९ ताबूत सम्हाले बैठे हैं।
गुरुवार, 21 जनवरी 2010
गरीबी के बाद अब झोंपड़ी हटाओ अभियान
सम्राट चन्द्रगुप्त के प्रधान मंत्री का निवास शहर के बाहर पर्णकुटी में देख चीन के यात्री फाह्यान ने जब चाणक्य से कारन पूछा तो चाणक्य का उत्तर था- जहाँ प्रधान मंत्री कुटिया में रहता है वहां के निवासी भव्य भवनों में रहते हैं और जिस देश का प्रधान मंत्री राज प्रासादों में रहता है वहां की जनता झोंपड़ों में रहती है ;चाणक्य के अनुसार आदर्श राज्य संस्था वह है जिसकी योजनाये प्रजा को उसके भूमि, धन धन्यादी पाते रहने के मूलाधिकार से वंचित कर देने वाली ना हों . उसे लम्बी चौड़ी योजनाओं के नाम से कर भार से आक्रान्त ना कर डाले. चाणक्य की नीति की उपेक्षा कर आज के स्वार्थी, लोभी और देश द्रोही राज नेताओं ने अपने लिए विशाल महल खड़े कर लिए और देश की ७८% आबादी २०/- से भी कम पर गुज़र बसर करने को मजबूर है.
खाद्य मंत्रीजी की कोप कृपा से आज महंगाई ने सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं : देश के प्रितिनिधियों की हिमाकत तो देखो . गरीब को रोटी २ रुपये और दाल या सब्जी की प्लेट १० रुपये में जब की संसद की कैंटीन में रोटी ५० पैसे और दाल -सब्जी की प्लेट ५/- में मिल रही है. भूखी जनता को सस्ते दामों पर खाद्य पदार्थ मुहैया करवाने की जिमेइवारी है जिस मंत्री की, वह अपने सम्बन्धियो को लाभ पहुचने की चिंता में नित नए नए बयान दाग रहा है और महंगाई नई नई बुलंदियों को छू रही है.
आज़ादी के बाद ऐसे नेताओं की जनविरोधी नीतिओं और निरंतर भ्रष्टाचार के कारण आज देश के ६०० नगरों की १५% आबादी झुग्गी झोपड़ों में में नारकीय जीवन जीने को मजबूर है. इनमें भी सबसे बुरा हाल इस ' चिंदी चोर 'नेता के प्रदेश महाराष्ट्र का है जहाँ २५% लोग झुग्गी झोपड़ों में कीड़े मकौड़ो सा जीवन जीते हैं.इसी प्रकार आंध्र में १४%, प; बंगाल में १०%,यू;पी ; में ९% और ऍम पी व् दिल्ली में ५-५% .मुंबई में १६४ लाख की आबादी में झुग्गी वासिओं की फौज ५४ लाख को पार कर गई है. दिल्ली की १२९ लाख की आबादी में यह संख्या २० लाख है, कोलकत्ता की १३२ लाख की आबादी में १५ लाख ,चेन्नई की ६६ लाख में ८ लाख जबकि नागपुर और फरीदाबाद की क्रमश २१ और ११ लाख की आबादी पर झुग्गी बाशिंदों की संख्या ७ और ५ लाख है. आज़ादी के ६२ साल बाद भी सरकार अभी नित नई नई योजनाये बना कर ' इंदिरा जी के गरीबी हटाओ के नारों' की याद ताज़ा की जा रही है. नई योजना में गरीबी की तरहां ही २०३० तक सभी झोपड़ों को भी हटा दिया जाएगा . ज़ाहिर है पुरानी योजनाओं की तरहां इस नई योजना का पैसा भी भ्रष्ट नेताओं, अफसरों की तिज़ोरिओं की शोभा बढ़ाएगा और फिर स्विस बैंकों में पहुँच जाएगा., जो अब ७० लाख करोड़ है फिर कुछ लाख करोड़ और बढ़ जाएगा. .... अरे जो इस कड़ाके की सर्दी में फुटपाथों पर तड़प रहे हैं उनके नाम कोई योजना के बारे अभी सोचा ही नहीं गया...नयी कमाई की योजना पर अभी काबिना की बैठक बुलाई जाएगी. ...अगली सर्दी का इंतज़ार करिए भई......
खाद्य मंत्रीजी की कोप कृपा से आज महंगाई ने सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं : देश के प्रितिनिधियों की हिमाकत तो देखो . गरीब को रोटी २ रुपये और दाल या सब्जी की प्लेट १० रुपये में जब की संसद की कैंटीन में रोटी ५० पैसे और दाल -सब्जी की प्लेट ५/- में मिल रही है. भूखी जनता को सस्ते दामों पर खाद्य पदार्थ मुहैया करवाने की जिमेइवारी है जिस मंत्री की, वह अपने सम्बन्धियो को लाभ पहुचने की चिंता में नित नए नए बयान दाग रहा है और महंगाई नई नई बुलंदियों को छू रही है.
आज़ादी के बाद ऐसे नेताओं की जनविरोधी नीतिओं और निरंतर भ्रष्टाचार के कारण आज देश के ६०० नगरों की १५% आबादी झुग्गी झोपड़ों में में नारकीय जीवन जीने को मजबूर है. इनमें भी सबसे बुरा हाल इस ' चिंदी चोर 'नेता के प्रदेश महाराष्ट्र का है जहाँ २५% लोग झुग्गी झोपड़ों में कीड़े मकौड़ो सा जीवन जीते हैं.इसी प्रकार आंध्र में १४%, प; बंगाल में १०%,यू;पी ; में ९% और ऍम पी व् दिल्ली में ५-५% .मुंबई में १६४ लाख की आबादी में झुग्गी वासिओं की फौज ५४ लाख को पार कर गई है. दिल्ली की १२९ लाख की आबादी में यह संख्या २० लाख है, कोलकत्ता की १३२ लाख की आबादी में १५ लाख ,चेन्नई की ६६ लाख में ८ लाख जबकि नागपुर और फरीदाबाद की क्रमश २१ और ११ लाख की आबादी पर झुग्गी बाशिंदों की संख्या ७ और ५ लाख है. आज़ादी के ६२ साल बाद भी सरकार अभी नित नई नई योजनाये बना कर ' इंदिरा जी के गरीबी हटाओ के नारों' की याद ताज़ा की जा रही है. नई योजना में गरीबी की तरहां ही २०३० तक सभी झोपड़ों को भी हटा दिया जाएगा . ज़ाहिर है पुरानी योजनाओं की तरहां इस नई योजना का पैसा भी भ्रष्ट नेताओं, अफसरों की तिज़ोरिओं की शोभा बढ़ाएगा और फिर स्विस बैंकों में पहुँच जाएगा., जो अब ७० लाख करोड़ है फिर कुछ लाख करोड़ और बढ़ जाएगा. .... अरे जो इस कड़ाके की सर्दी में फुटपाथों पर तड़प रहे हैं उनके नाम कोई योजना के बारे अभी सोचा ही नहीं गया...नयी कमाई की योजना पर अभी काबिना की बैठक बुलाई जाएगी. ...अगली सर्दी का इंतज़ार करिए भई......
बुधवार, 20 जनवरी 2010
युवराज इन की भी सुध लो....
युव राज इन की भी सुध ले लो......... दूर दराज़ गाँव में हरिजन बस्तिओं में नंगे बच्चों को गोदी में उठाये जब आप की मनोहारी सूरत देश के बड़े समाचार पत्रों में या फिर एन दी टी वि जैसे चेन्नलों पर देखता हूँ तो तो मन बाग़ बाग़ हो उठता है. याकीन नहीं होता की महात्मन गाँधी का पुनर्जनम हुई गवा.....यह गुर जरूर दिग्गी भैया ..वाही कांग्रस के चाणक्य ..ने सिखाया होगा. भारत का भावी प्रधान मंत्री तराशने का भागीरथ कार्य उन्हेही सौंपा गया है. दिग्गी भैया से पूछ कर युवराज कभी दिल्ली भ्रमण को भी निकलो .. वेह भी रात को ..यहाँ भी हजारों बच्चे ,बूढ़े ,औरतें सड़क के किनारे फुटपाथ पर पड़ी हैं वेह भी इस कड़क कडाती ठण्ड में .... आप अपनी फोटो देखने को ही सही बड़े अखबार तो देखते ही होंगे. हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाई है ..एम् सी डी के उस हलफनामे पर जिसमें इन फुट पाथिओं के लिए ६० लाख में २७ रैनबसेरे बनाने में अपनी मजबूरी जताई ही...दिल्ली में ऐसे १४० रैन बसेरों की दरकार है.
अरे इस लोकतान्त्रिक सरकार से तो वे रजवाड़े ही इन गरीब लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील थे जिन्होंने अपने राज्य में सभी साहूकारों को निर्देश दे रखे थे की सर्दी में अपनी हवेली के अहाते में अलाव जलाएं ताकि रात को उस क्षेत्र के बेसहारा गरीब भीषण शीत से राहत पा सकें. हर शहर, कसबे और गाँव में रैनबसेरे और धरम शालाए उन रजवाड़ों की ही देन हैं. और एक आप की यह दिल्ली सरकार है जो इन रैनबसेरों को उजाड़ने में व्यस्त है...ताकि खेलों के लिए इसे सुन्दर बनाया जा सके ....अरे फुटपाथों पर हजारों लोग इस ठंडी में कांपते हुए जब विदेशी मेहमान देखेंगे तो क्या सोचेंगे.!
इनके लिए ना सही अपनी नाक की खातिर ही सही इन्हें खेलो तक ही सही रैनबसेरों में छुपा दो. ....युवराज इनकी भी सुध लो ...गरीबों की दुआएं ले लो...राम भली करेंगे ....
अरे इस लोकतान्त्रिक सरकार से तो वे रजवाड़े ही इन गरीब लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील थे जिन्होंने अपने राज्य में सभी साहूकारों को निर्देश दे रखे थे की सर्दी में अपनी हवेली के अहाते में अलाव जलाएं ताकि रात को उस क्षेत्र के बेसहारा गरीब भीषण शीत से राहत पा सकें. हर शहर, कसबे और गाँव में रैनबसेरे और धरम शालाए उन रजवाड़ों की ही देन हैं. और एक आप की यह दिल्ली सरकार है जो इन रैनबसेरों को उजाड़ने में व्यस्त है...ताकि खेलों के लिए इसे सुन्दर बनाया जा सके ....अरे फुटपाथों पर हजारों लोग इस ठंडी में कांपते हुए जब विदेशी मेहमान देखेंगे तो क्या सोचेंगे.!
इनके लिए ना सही अपनी नाक की खातिर ही सही इन्हें खेलो तक ही सही रैनबसेरों में छुपा दो. ....युवराज इनकी भी सुध लो ...गरीबों की दुआएं ले लो...राम भली करेंगे ....
गुरुवार, 14 जनवरी 2010
धरा- दिनकर का लुका छिपी महोत्सव ......
उतरायण के प्रथम दिवस आज दिनकर धरा संग लुक्का छिप्पी का खेल खेलेंगे .....
अनादी काल से एक पैर पर गोलाकार नृत्य में निमग्न धरा अपने प्रियतम की परिक्रमा में तल्लीन है और दिनकर भी निरंतर निहारते हुए अपनी उर्जा की पुष्प वर्षा कर उसे अक्खंड सौभाग्यवती भव की मंगल आशीष से आनंदित कर रहे हैं . भ्रमांड के इन प्रथम प्रेमिओं के सृष्टि सम्भोग का आज महोत्सव है. उत्सव का शुभारम्भ प्रात : ९.३५ और समापन सांय ३.३८ पर निश्चित हुआ और चाँद ने मंच संचालन का जिम्मा संभाल लिया है. धरा ने आँखें बंद कर लीं और दिनकर ने छुपने का स्थान ढूंढने की कवायत शुरू कर दी...... लो दिनकर छुप गए और धरा दबे पाँव अपने प्रियतम को ढून्ढ रही है. ...चाँद चुप चाप इस खेल को निहार ..ठंडी आहें भर रहा है. मानो तीनों आज सदिओं के बाद इतनी लम्बी छुट्टी पर पिकनिक माना रहे हैं ..पिछले कई दिनों से सूर्या देव इस उत्सव की तैयारी में लगे थे बादलों की ओट में छुपने का अभ्यास कर रहे थे और धरा उनके इस छुपा छुपी के खेल से पानी पानी हो पिंघल कर जमी जा रही थी .
वैज्ञानिक विशाल काय दूरबीनों से इस महापर्व को निहार रहे हैं और इस महा सृष्टि सम्भोग से पैदा होने वाली उथल पुथल की विवेचना में लगे हैं और हम लोग अपने परलोक की चिंता में ग्रस्त प्रदूषित-पवित्र ठन्डे जल की डुबकियां लगाने में व्यस्त हैं .....हम तो भई इतनी ठंडी में 'पंच-स्नान ' से ही संतुष्ट हैं .
अनादी काल से एक पैर पर गोलाकार नृत्य में निमग्न धरा अपने प्रियतम की परिक्रमा में तल्लीन है और दिनकर भी निरंतर निहारते हुए अपनी उर्जा की पुष्प वर्षा कर उसे अक्खंड सौभाग्यवती भव की मंगल आशीष से आनंदित कर रहे हैं . भ्रमांड के इन प्रथम प्रेमिओं के सृष्टि सम्भोग का आज महोत्सव है. उत्सव का शुभारम्भ प्रात : ९.३५ और समापन सांय ३.३८ पर निश्चित हुआ और चाँद ने मंच संचालन का जिम्मा संभाल लिया है. धरा ने आँखें बंद कर लीं और दिनकर ने छुपने का स्थान ढूंढने की कवायत शुरू कर दी...... लो दिनकर छुप गए और धरा दबे पाँव अपने प्रियतम को ढून्ढ रही है. ...चाँद चुप चाप इस खेल को निहार ..ठंडी आहें भर रहा है. मानो तीनों आज सदिओं के बाद इतनी लम्बी छुट्टी पर पिकनिक माना रहे हैं ..पिछले कई दिनों से सूर्या देव इस उत्सव की तैयारी में लगे थे बादलों की ओट में छुपने का अभ्यास कर रहे थे और धरा उनके इस छुपा छुपी के खेल से पानी पानी हो पिंघल कर जमी जा रही थी .
वैज्ञानिक विशाल काय दूरबीनों से इस महापर्व को निहार रहे हैं और इस महा सृष्टि सम्भोग से पैदा होने वाली उथल पुथल की विवेचना में लगे हैं और हम लोग अपने परलोक की चिंता में ग्रस्त प्रदूषित-पवित्र ठन्डे जल की डुबकियां लगाने में व्यस्त हैं .....हम तो भई इतनी ठंडी में 'पंच-स्नान ' से ही संतुष्ट हैं .
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